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नौजवान बच्चा…!

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रेलगाड़ी अपनी पूरी ऱफ्तार से दौड़ रही थी। डिब्बे में बैठा कोई यात्री किताब पढ़ रहा था, कोई कुछ खा रहा था, तो कुछ लोग खिड़की से बाहर निहार रहे थे। खिड़की के पास बैठा एक पिता और उसका पुत्र जाने-अनजाने में सबका ध्यान खींच रहे थे। पुत्र की आयु 24-25 बरस की होगी। चेहरे से वह पढ़ा-लिखा और बुद्धिमान नजर आ रहा था। लेकिन उसकी गतिविधियां देखकर हर कोई हैरान था, सिवाय उसके पिता के।
वह नौजवान लगातार खिड़की से बाहर के नजारों का वर्णन किए जा रहा था। कभी वह पिता की बांह झिंझोड़कर कहता- पापा, देखिए, कितना हरा-भरा पेड़ है। कभी कहता- वाह! वह कौआ कितना काला है! कुछ आगे नदी देखकर वह बच्चों की तरह मचलने लगा- पापा-पापा, नदी का पानी कितना साफ़-स्वच्छ नजर आ रहा है! कभी वह आसमान में उमड़ते बादलों को देखकर ख़ुश होता, तो कभी चिड़ियों के झुंड को देखकर चहकने लगता।
उसे तो काली-सफ़ेद-भूरी गायों का झुंड भी बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था। उस नौजवान को देखकर कोई मुस्करा कर आगे बढ़ जाता, तो कोई उसके पिता को सहानुभूति की दृष्टि से देखता। एकाध ने तो उसकी तरफ़ इशारा करके उसका उपहास भी उड़ा दिया। हालांकि पिता को तो जैसे इस सब की कोई परवाह ही नहीं थी। वह अपने बेटे की ख़ुशी में और ख़ुश हो रहा था। आख़िर एक सहयात्री से रहा नहीं गया। वह कह ही बैठा, ‘भाईसाहब, लगता है आपके पुत्र को कोई मानसिक समस्या है।’ पिता ने बग़ैर बुरा माने जवाब दिया, ‘दरअसल, पांच साल की उम्र में इसकी आंखों की रोशनी चली गई थी और कल ही ऑपरेशन के बाद इसने दुनिया को दुबारा देखना शुरू किया है।’