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स्वतंत्र विचार: आखिर कब थमेगा रेप का ये वाहियात खेल?

 

रेप, बलात्कार, इज्ज़त लूटना. ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो कोई भी लड़की अपने नाम के साथ जोड़ना नहीं चाहती. और मान लो यदि दुर्भाग्यवश ये शब्द आपके नाम के आगे जुड़ गए तो आपकी ज़िन्दगी ख़त्म हैं.

ऐसा नहीं हैं कि विक्टिम लड़की अपने साथ हुए इस खौफनाक मंजर को भुला कर नई ज़िन्दगी शुरू करना नहीं चाहती बल्कि असली जड़ तो ये समाज हैं, जो उसके दामन पर लगे दाग़ को धुलने नहीं देता. वो इस बात का पूरा ख्याल रखता हैं कि उसकी ज़िन्दगी नर्क से बत्तर बन जाए.

रेप की शिकार लड़की से शादी करना तो बहुत दूर की बात हैं ये जजमेंटल समाज तो उसे इज्ज़त के साथ उठने बैठने भी नहीं देता हैं. जैसे सारी गलती उस लड़की की ही हैं. वो रात को 9 बजे तक घर वापस क्यों नहीं आई? उसने छोटे कपड़े क्यों पहने थे? शराब पीकर दोस्तों के साथ पार्टी करेगी तो ऐसा ही होगा. और भी ना जाने क्या क्या.

लेकिन बहुत ही कम लोग होंगे जो पलट कर बोलेंगे

“सारी गलती उस लड़के की हैं. अगर उसके घर वालों ने उसे लड़कियों की इज्ज़त करना सिखाया होता और ऐसे गलती करने पर दो झापट जड़ें होते तो आज उनका बेटा रेप का वाहियात खेल नहीं खेल रहा होता.”

“छोटे लड़की के कपडें नहीं, लोगो की सोच होती है.”

“लड़कों की तरह लड़कियों को भी देर रात पार्टी करने का अधिकार हैं.”

“यदि किसी लड़की ने शराब पी हैं तो इसका ये मतलब नहीं की लड़कों को उनसे बलात्कार करने का लाइसेंस मिल गया हैं.”

सच तो यह हैं कि चंद लोग जो ऐसी बाते करते हैं वो भी सोशल मीडिया तक ही इसका पालन कर पाते हैं. बहुत कम लोग होते हैं जो वास्तविक जीवन में भी इस विचारधारा को अपनाते हैं.

लेकिन बस. अब बहुत हो चुका. अब वक़्त आ गया हैं कि देश के नौजवान रेप के इस वाहियात खेल को रोकने का जिम्मा संभाले. इसके लिए युवकों को दो स्तर पर काम करना होगा.

  1. नई जनरेशन को नई सोच में ढालें: जितने भी यंग पेरेंट्स हैं या जो आगे चलकर पेरेंट्स बनेंगे उन्हें अपने बच्चों को लड़कियों की इज्ज़त करना सिखाना होगा. उनकी सोच का दायरा बढ़ाना होगा. उन्हें हवस के बुरे रास्तें से दूर रखते हुए प्यार और रिश्ते नातों के रास्तें पे कदम बढ़ाना सिखाना होगा.
  2. पुरानी जनरेशन की सोच बदलें: अब वक्त आ गया हैं कि जब भी माता पिता, दादा दादी, रिश्तेदार, पड़ोसी या राह चलता कोई भी इंसान रेप के मामले में लड़की की गलती निकाले या उसके बारे में कुछ बुरा कहे तो आप उन्हें टोके. उन्हें समझाए कि असली गुन्हेगार लड़की नहीं बल्कि लड़का हैं. आप उन्हें ये भी समझाए कि अपनी बेतुकी सोच का डिंडोरा पीटने से कैसे लड़की की ज़िंदगी नर्क बन जाती हैं.

हमे उम्मीद हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब अखबारों और न्यूज़ चैनलों से रेप की खबरों का नमो निशान मिट जाएगा.

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